दुनियादारी

ज्यों-ज्यों हम समझदार हुए
दुनियादारी से दो-चार हुए
भाई-बंधु न कोइ किसी का
रिश्ते-नातेअब सब व्यापार हुए

चूल्हा-चौका घर-चौबारा
सब बन्दर-बाँट हुआ
हाँ 'मै' में सिमट गया
अपनापन लाचार हुआ

भाई-बंधु ही नहीं
अब तो माँ-बाप भी रिश्तेदार हुए
रूठो को अब कौन मनाये
प्रीत की रीत भी अब कौन निभाए
 सबके अन्दर अब अहम् भाव जगे

जो रहते थे कभी दिलो मे
अब वो घर मे भी भार हुए
कहाँ ढूंढें अब वो रिश्तों की मिठास
 चारो ओर फ़ैल गया अब
अपने -बेगाने का भेद-भाव