चले गए हो जब से तुम
सब कुछ सूना-सूना लगता है
मौन हो गया पंछियों का कलरव
घर-आँगन बिलखा करता है
रोता है ड्रेसिंग -टेबुल का शीशा
कंप्यूटर सिसका करता है
तरतीब से सजी किताबें
और सहेजे तेरे कपडे
तितर-बितर होने को
हरदम मचला करतें हैं
नित नये व्यंजनों की फरमाइश
की न आती अब आवाज कहीं से
चौके के आगे रखा सूना पटरा
मौन विलाप अब करता है
याद तेरी जब बहुत सताती
ड्रेसिंग-टेबुल के शीशे में
तेरा अक्स मैं ढूँढा करती हूँ
फैला देतीं हूँ सहेजे कपडे
और किताबों की अलमारी
तितर-बितर कर देतीं हूँ
फिर खाली कड़ाही चड़ा बुझे चूल्हे मे
और बैठा तुझे मन के चौके में
नित नये व्यंजन पका-पका
मैं तुझे रोज जिमाया करती हूँ
थपकी देते हाथ रुक गये
लोरी गाते होठ मौन हो गये
आँखों को देकर अंसुअन की सौगात
न जाने कौन सी गठरी में
बाँध ले गया तू मन का चैन
माँ के हिर्दय की करुण पुकार
न जाने कब तुझको वापस ले आये
हर पल मैं बस इसी इन्तजार में
विधवा की मांग सी सूनी
सडक निहारा करती हूँ
चले गए हो जब से तुम...
सब कुछ सूना-सूना लगता है
मौन हो गया पंछियों का कलरव
घर-आँगन बिलखा करता है
रोता है ड्रेसिंग -टेबुल का शीशा
कंप्यूटर सिसका करता है
तरतीब से सजी किताबें
और सहेजे तेरे कपडे
तितर-बितर होने को
हरदम मचला करतें हैं
नित नये व्यंजनों की फरमाइश
की न आती अब आवाज कहीं से
चौके के आगे रखा सूना पटरा
मौन विलाप अब करता है
याद तेरी जब बहुत सताती
ड्रेसिंग-टेबुल के शीशे में
तेरा अक्स मैं ढूँढा करती हूँ
फैला देतीं हूँ सहेजे कपडे
और किताबों की अलमारी
तितर-बितर कर देतीं हूँ
फिर खाली कड़ाही चड़ा बुझे चूल्हे मे
और बैठा तुझे मन के चौके में
नित नये व्यंजन पका-पका
मैं तुझे रोज जिमाया करती हूँ
थपकी देते हाथ रुक गये
लोरी गाते होठ मौन हो गये
आँखों को देकर अंसुअन की सौगात
न जाने कौन सी गठरी में
बाँध ले गया तू मन का चैन
माँ के हिर्दय की करुण पुकार
न जाने कब तुझको वापस ले आये
हर पल मैं बस इसी इन्तजार में
विधवा की मांग सी सूनी
सडक निहारा करती हूँ
चले गए हो जब से तुम...