कभी हंसाते कभी रुलाते रिश्ते
नित नया रूप दिखाते रिश्ते
कभी प्यार का फूल खिलाते
कभी कांटे बन चुभ जाते रिश्ते
रिश्ता कोई अब अनमोल नहीं है
संबोधन का भी कोई मोल नहीं है
माली ही खुद जब बगिया लूटे
फिर किससे कौन निभाए रिश्ते
झूठ -फरेब की बातों से
अपना स्वार्थ बनाते रिश्ते
कोमल अहसासों की लाशों को
स्वार्थ की सूली रोज चडाते रिश्ते
कोई खोज रहा है दौलत
कोई खोज रहा है शोहरत
किसको समझे जग में अपना हम
जब खुद छलती यहाँ मोहब्बत
हर आंसू हम पी सकते हैं
मरुस्थल में भी प्यासे जी सकते है
प्यार के तेरे चंद बोलों के बदले
हर गम हंसकर हम सह सकते है
पतझड़ में भी फूल खिला देते है
जब-जब प्यार लुटाते रिश्ते
हर पल हमको तरसाते रहते
यादों के दंश चुभोते रिश्ते
कभी हंसाते कभी रुलाते रिश्ते
नित नया रूप दिखाते रिश्ते